दुनिया की सारी
जंगे लड़ी गई
शांति के नाम पर..
बहाया गया लहु इंसानों का
शांति के नाम पर..
जो थी सहज सुलभ
बस एक कदम रुकने पर,
उसे लहु से रंगा गया
शांति के नाम पर..
सदियों जैसे
ठेकेदारों ने है बेचा ईश्वर को,
धर्म के नाम पर..
वैसे ही बेचते
कुछ दलाल युद्ध को,
शांति के नाम पर..
मकसद युद्ध के
हो जाते बौने,
छूट जाते पीछे कहीं
युद्ध को थोपा गया,
शांति के नाम पर..
कुछ यू हीं
जैसे धंधा बनाया भगवान को
विषवृक्ष रोपा गया,
धर्म के नाम पर..
दान,चढ़ावों पर पलते मठाधीश
रोटी को तरसता बचपन
बिकते देह
चूल्हों में आग
जलाने को,
धर्म के नाम पर..
यूं ही कुछ सजते
असलहों के बाज़ार
शांति के नाम पर..
धर्म और शांति
दोनों ही बिकते
छद्म मुखौटों में..
लूटा,ठगा जाता
हर बार इंसान,
कभी शांति कभी
धर्म के नाम पर..
14.07.26
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