Thursday, August 27, 2026

ये किसके अधरों से

 ये किसके अधरों से टपकी

 लालिमा नभ में है?

ये किसके कंठ का मधुप

पक्षियों के कलरव में है?

है कौन जिसने पुष्पों पर

बिखेरा अपना नमक है..

ये किसके नयनों की आस

तैरती क्षितिज में है?

ये किसके आँचल के रंगों से 

सजी धरा है?

ये कौन झुरमुट में खड़ा

वसुधा पर डाले बांहों का घेरा है?

है किसका ये श्यामल प्रतिबिम्ब?

उकरा श्वेत झील के कोरों पर है..

ये किसकी बांसुरी की तान पे

नाचती भोर है

ये किसकी स्मृति में

खोई पायल राधे की

गुमसुम निहारे चहुँ ओर है..


27.08.26

Sunday, August 9, 2026

राहुल गांधी

 कहते है कि संघर्ष व्यक्तित्व को परिष्कृत करता है, प्रत्येक व्यक्ति का संघर्ष अलग अलग तरह का हो सकता है।

आजकल नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी को देख कर ऐसा लग रहा कि वे अपने हिस्से का संघर्ष कर चुके है। उनके वक्तव्यों, मुद्दों और छात्रों के साथ संवाद में दिख रहा कि वे जनता की नब्ज समझ चुके है। जिस तरह से पहली बार वो संघ और भाजपा की रणनीति पर सधे हुए हमले कर रहे और लोगो को यह समझाने में सफल हो रहे है कि कैसे ये व्यवस्था अब तक कुछ भी परिणाम नहीं दे सकी है मात्र मीडिया मैनेजमेंट और संस्थानों पर नियंत्रण के बल पर सत्ता पर पकड़ बनाई हुई है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष सरकार के लिए खुद ही एक लक्ष्मण रेखा खींच देता है। भले देर से ही सही विपक्ष की मजबूत आवाज सुनाई दे रही तो यह शुभ संकेत है। राहुल गांधी की इस परिपक्वता और प्रयासों का स्वागत है...


09.08.26

Thursday, July 23, 2026

सत्ता की अहंकार

 जब सत्ता रखती 

रखैल हो,

लोकतंत्र के स्तंभों को 

जब महफिलों में 

सत्ता की,

करती मुजरा मीडिया हो,

जब माय लार्ड !

बनाते जाम हो

ऐसी किस्मत पर

सत्ता को 

क्यों न अहंकार हो?


इस लोकतंत्र में जहाँ

तंत्र प्रतिगामी हो,

जनतंत्र में घुटती

लोगो की सांस हो,

झूठ का गुंडाराज हो

फिर भी मौन सर्वत्र हो

ऐसी राजशाही पर

सत्ता को 

क्यों न अहंकार हो?


जब चोर दरवाजे से

बिकी विपक्ष की

आवाज हो,

जब भूल संविधान 

नौकरशाही ने,

सत्ता को ही

माना भगवान हो

जब शिक्षक का

ज़मीर गिरवी,

कलम मोहताज हो,

ऐसी गुलामो की फौज पर

सत्ता को

क्यों न अहंकार हो?


जब नैनिहाल 

देश के,

पिटते सड़को पर हों

हक़ की बात करने वाले 

सड़ते जेल में हों

जब माफिया के हाथों में

कमान संसाधनों की हो

जब देशभक्ति के,

बदल दिए गए मायने हों

डरी, सहमी कौम हो,

ऐसे गुंडाराज पर

सत्ता को 

क्यों न अहंकार हो?


23.07.26

Wednesday, July 22, 2026

बरसाओ लट्ठ

 बरसाओ लट्ठ, 

उतार दो सिर कांधे से

ये जवानी है कायरों,

डरती नहीं मर जाने से

जुल्म की इंतिहा भी

ओ कातिल

रोक न सकेगी 

इंकलाब आने से!!!

है ये तेरे तौर तरीको की नुमाइश

तो है हमारे भी हौसलों की आजमाइश

ज़ालिम जीतेगा या सब्र

ये लिखेगा वक़्त

हमने बनाया अब 

खूं को अपने

रोशनाई है...


20.07.26

जनादेश से निकले

 सुनो बच्चों!!

बेशक तुम्हारा आग्रह जायज़ है

और गुस्सा भी, 

इस नक्कारी व्यवस्था पर।

नहीं है गलत 

विरोध का रास्ता भी,

मुर्दा बन जीने से 

जुबां खोल

मरना ही सही

पर सोचो ठहर के!

एक दिन ...

जनादेश से निकला जो दैत्य था

वह क्या 

भूख हड़तालों से जाएगा?

जिसे हमने बैठाया

सिंहासन पर..

वो लाठियां खाने से 

हट जाएगा?

जिसे हमने किया पैदा,

उसे हमे ही 

मिटाना होगा 

जनादेश से 

आये दैत्य को 

जनादेश से भगाना होगा..

जी जाएंगे

ये रक्तबीज फिर से..

जो एक डग भी 

फिसला तुम्हारा अहिंसा से

ये नई साजिशें रचेंगे

बांटेंगे तुम्हें फांक फांक

फूट से तुम्हारी,

सत्ता का रास्ता बनाएंगे

दे कर अफीम

धर्म की!

शरीर तुम्हारे 

नोच खाएंगे,

लोकतंत्र में

सत्ता का मद

बैलेट से उतारा जाता है..

राजनीति के दम्भ को

चुनाव में झाड़ा जाता है,

है स्वांग चहुँ ओर

तुम इनसे बच कर निकलना

तुम्हें कीड़ा मकौड़ा 

समझने वाली

राजनीति को

चुनाव में राजनीति सिखाना

भूल जाना,

हिन्दू-मुसलमान

अगड़ा या पिछड़ा

रखना याद तिरंगा 

और ये कि 

बस भारतीय हो तुम!!!

है लोकतंत्र में 

आस्था इस देश की

इसी मार्ग से

अहंकार को धूल चटाना,

जनादेश से निकले दैत्य को

जनादेश से भगाना...


22.07.26