Saturday, September 26, 2026

सन्देह में चुनाव आयोग

 अजीब सी आशंकाओं और ग्लानि से मन भरा है। जब से इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और उसके बाद के घटनाक्रम को देख रही हूं मन परेशान होता जा रहा है। पिछले कई वर्षों से राहुल गांधी एवं विपक्ष के लगभग सभी नेता कभी न कभी चुनाव आयोग और ई वी एम को संदिग्ध साबित करने के प्रयास करते रहे है। लेकिन मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि जिस चुनाव प्रक्रिया में लाखों लोग शामिल हैं, चुनाव करवाने में इस देश मे एक इतना बड़ा तंत्र सीधे सीधे शामिल है उसमें क्या कुछ मुट्ठी भर लोग भी ऐसे नहीं होंगे जो गलत और बेईमानी के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हों? इस कारण मुझे इस व्यवस्था में अनेक दोषों के बाद भी विश्वास बना रहा। हमेशा यह लगता रहा कि कुछ गड़बड़ियां अवश्य हो सकती हैं पर पूरी चुनाव प्रक्रिया ही संदिग्ध, अविश्वसनीय और असफल नहीं हो सकती। लोकतंत्र में संस्थाओं की शुचिता निष्कलंक और असंदिग्ध रहना लोकतंत्र के लिए परम आवश्यक है। लेकिन जो कुछ भी सामने आ रहा वो बेहद दुखी और चिंतित करने वाला है। सच क्या है??? शायद कभी स्पष्ट नहीं हो पायेगा। ऐसी परिस्थितियों में आम जनता को किस पर विश्वास करना चाहिए? क्या आज सड़को पर विपक्ष जो करने का प्रयास कर रहा है उसमें सच है या यह भी चुनाव से प्रेरित है, अब हमें बेवकूफ बनाया जा रहा कि पहले बनाये गए? सच क्या है सोच सोच कर मन परेशान है। मीडिया, न्यायपालिका,कार्यपालिका कौन विश्वास करने योग्य रह गया है? लोकतंत्र में फैसले क्या अब सड़कों पर ही होंगे? क्या जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की कोई नैतिकता शेष नहीं बची है? एक समाज के रूप में हम कितने खोखले हो चुके है, व्यवस्था जिसे भी चुनती है, पदों पर आसीन करवाती है वे सब अपने उत्तरदायित्व से आंखे कैसे बन्द कर लेते है? शायद हमें एक समाज के रूप आत्मवलोकन की गहरी आवश्यक्ता है एक भ्रष्ट और कायर समाज एक भ्रष्ट और कायर व्यवस्था ही बनाएगा, जहाँ सब मौका आने पर एक जैसे ही अनैतिक सिद्ध होगें किसी मे भी गलत को रोकने का साहस नहीं होगा। इनके नाम अलग अलग हों सकते हैं पर दुर्भाग्य से कार्यशैली एक सी निकलेगी।

इति