नही होता घटित अकस्मात,
जीवन में , कुछ भी
न ही रोकता प्रतिरोध,
न बदलता परिणाम, कुछ भी
बहती नदिया सागर तक
काट पहाड़ जैसा, कुछ भी
ठहरता नही इस धरा पर
जड़ चेतन, कुछ भी
बीतते, सुंदर-असुंदर सब
नहीं बांधता उन्हें, कुछ भी
है दृष्टि, दिशाओं का भेद
अतिरिक्त नहीं, कुछ भी
लिखे नियति विपरीत दिशा से
पढ़ते हम उलट, कुछ भी
अकस्मात होता हमारे लिए
विधि हेतु नहीं ऐसा, कुछ भी
मुक्ति में छिपी मुक्ति
न जाता चिता तक, कुछ भी
02.07.26
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