जब सत्ता रखती
रखैल हो,
लोकतंत्र के स्तंभों को
जब महफिलों में
सत्ता की,
करती मुजरा मीडिया हो,
जब माय लार्ड !
बनाते जाम हो
ऐसी किस्मत पर
सत्ता को
क्यों न अहंकार हो?
इस लोकतंत्र में जहाँ
तंत्र प्रतिगामी हो,
जनतंत्र में घुटती
लोगो की सांस हो,
झूठ का गुंडाराज हो
फिर भी मौन सर्वत्र हो
ऐसी राजशाही पर
सत्ता को
क्यों न अहंकार हो?
जब चोर दरवाजे से
बिकी विपक्ष की
आवाज हो,
जब भूल संविधान
नौकरशाही ने,
सत्ता को ही
माना भगवान हो
जब शिक्षक का
ज़मीर गिरवी,
कलम मोहताज हो,
ऐसी गुलामो की फौज पर
सत्ता को
क्यों न अहंकार हो?
जब नैनिहाल
देश के,
पिटते सड़को पर हों
हक़ की बात करने वाले
सड़ते जेल में हों
जब माफिया के हाथों में
कमान संसाधनों की हो
जब देशभक्ति के,
बदल दिए गए मायने हों
डरी, सहमी कौम हो,
ऐसे गुंडाराज पर
सत्ता को
क्यों न अहंकार हो?
23.07.26
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