Monday, September 1, 2025

नाग का फन...

 नाग का फन, कुचलने का हुनर सीखा है

बज़्म में तेरी काटा जो अरसा हमने

ज़हर उतारने का हुनर सीखा है।


न सोच कि ज़ाया अपनी ज़िंदगी की है 

तेरी रहबरी में हमने

ज़ालिमो से लड़ने का हुनर सीखा है।


माना कि, एक उम्र बेफिक्र दिखे हम है

संगत में तेरी हमने 

आजमाइश का हुनर सीखा है।


01.09.25

Tuesday, August 26, 2025

वंचना और पीड़ा..

 वंचना और पीड़ा

सिर्फ 

शब्द नहीं..


हैं कथा किसी

दुख 

भरे हृदय की..


हों पहचानते जैसे 

गूंगे

स्वरों का मोल..


यूँ ही पहचानती

 वंचना

गूंगी पीड़ा के बोल..


सुख की छाया में बैठे

आत्ममुग्ध

जाने क्या..


बेबसी में 

बहे

अश्रुओं का मोल..


क्या जाने 

निष्ठुरता

उस प्रतीक्षा को..


जो अपलक जाग रही

नयनों

को खोल..


26.08.25

Wednesday, June 25, 2025

पत्थरों के शहर में

 पत्थरों के इस शहर में

तपती, खामोश दुपहर में

सभ्यता के कचरे में

वह छिरती चंद सिक्को के लिए

बिनती कांटे,कीलें

ज़िंदगी के घाव सीने के लिए

इक लोहे की बुत सी वह

चलती ढेर पर लोहे के

लोहे के इस बेजान से शहर में

बिनती टुकड़े टुकड़े लोहे के 

कई कई टुकड़ो में बंटी रोटी के लिए

हर रोज़ की यही कहानी

कूड़े के ढेर में ही ज़िंदगी जानी

पेट की आग बुझाने को

सभ्य कहलाने वाले शहर की

खामोश गलियों में उम्र गुज़र जानी

Wednesday, June 4, 2025

फिर क्यों ह्रदय प्रश्नों से है घिरा हुआ

 मैं अपनी वंशबेल का

आखिरी बूटा, अंतिम शाख हूँ

है क्यों ह्रदय व्यथित,उद्वेग से भरा हुआ

टूटना तो हर बूटे को,

हर शाख का निश्चित जीवन

फिर क्यों ह्रदय प्रश्नों से है घिरा हुआ


खुद में समेटे खुद की दुनिया

मैं इस दुनिया का 

इकलौता मुसाफिर तो नही हूँ

है यायावरी नसीब अपना

तो नियति को स्वीकारने में

फिर क्यों, कोलाहल है हुआ


मैं अपनी वंश परम्परा का

आखिरी निशान हूँ

क्यों भयभीत सा हृदय मेरा

मिटते तो वो भी, 

हैं जो उत्कीर्ण प्रस्तरों पर

फिर क्यों हृदय विषाद से है घिरा हुआ


27.05.25

Saturday, May 18, 2024

अनंत प्रतीक्षा

 अनंत प्रतीक्षा को प्रेम 

जब उन्मेषित हो वर लेता है


झूमती धरती को आकाश 

जहाँ बाहों में भर लेता है


यत्किंचित न खुलते नयन

जब श्वासों का राग मिलता है


सिंदूरी लालिमा सजती

अलक पर बदरा झूमता है


तब क्षितिज पुलकित

कलियों सा सजता है


मधुप टपकता,पुष्प बरसते

जब यह मिलन होता है


अनंत प्रतीक्षा को प्रेम 

जब उन्मेषित हो वर लेता...


18.05.24