Tuesday, July 14, 2026

 नही होता घटित अकस्मात,

जीवन में , कुछ भी

न ही रोकता प्रतिरोध,

न बदलता परिणाम, कुछ भी

बहती नदिया सागर तक

काट पहाड़ जैसा, कुछ भी

ठहरता नही इस धरा पर 

जड़ चेतन, कुछ भी

बीतते, सुंदर-असुंदर सब

नहीं बांधता उन्हें, कुछ भी

है दृष्टि, दिशाओं का भेद

अतिरिक्त नहीं, कुछ भी

लिखे नियति विपरीत दिशा से

पढ़ते हम उलट, कुछ भी

अकस्मात होता हमारे लिए

विधि हेतु नहीं ऐसा, कुछ भी

मुक्ति में छिपी मुक्ति

न जाता चिता तक, कुछ भी


02.07.26

 एक एक सांस लड़

मृत्यु से जीता हूँ,

क्या बेंधेंगे विष बाण मुझे?

मैं मृत्यु शय्या से उठा हूँ...


हूँ तनिक नहीं विचलित मैं

जीवन पथ की कठनाइयों से,

क्या विचलित करेंगे ये मुझे?

मैं संघर्षों से प्रेरणा लेता हूँ..


दौड़ता लहु धमनियों में

करता उद्घोष ये!!

समर यह न थमेगा,

मैं योद्धा बन कर आया हूँ...


12.07.26

 दुनिया की सारी 

जंगे लड़ी गई

शांति के नाम पर..

बहाया गया लहु इंसानों का

शांति के नाम पर..

जो थी सहज सुलभ

बस एक कदम रुकने पर,

उसे लहु से रंगा गया

शांति के नाम पर..

सदियों जैसे 

ठेकेदारों ने है बेचा ईश्वर को,

धर्म के नाम पर..

वैसे ही बेचते 

कुछ दलाल युद्ध को, 

शांति के नाम पर..

मकसद युद्ध के 

हो जाते बौने,

छूट जाते पीछे कहीं

युद्ध को थोपा गया, 

शांति के नाम पर..

कुछ यू हीं 

जैसे धंधा बनाया भगवान को

विषवृक्ष रोपा गया,

धर्म के नाम पर..

दान,चढ़ावों पर पलते मठाधीश

रोटी को तरसता बचपन

बिकते देह

चूल्हों में आग

जलाने को,

धर्म के नाम पर..

यूं ही कुछ सजते 

असलहों के बाज़ार

शांति के नाम पर..

धर्म और शांति

दोनों ही बिकते

छद्म मुखौटों में..

 लूटा,ठगा जाता 

हर बार इंसान,

कभी शांति कभी

धर्म के नाम पर..


14.07.26

Thursday, January 15, 2026

पहचान मुझे!!

 जड़ में, चेतन में

धारों के प्रवाह में

स्रोतों के उछाह में

उपवन की हरीतिमा में

आकाश की नीलिमा में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

पहाड़ों के ठहराव में

घाटियों के गहराव में

धरा के फ़ैलाव में

ज्वलंत अग्निशिखाओं में

शीतल, ठंडी छाव में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

जलधि के अंतस में घूमते ज्वार में

महाकाल के हुँकार में

ध्वनियों के संगम ओंकार में

आकार में, निर्विकार में

व्योम से अंतरिक्ष के एकाकार में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

सृष्टि की सुंदरता में

रण की वीभत्सता में

प्रत्यक्ष में, अदृश्य में

घटित में, अघटित में

प्रसन्नता, शोक में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

जब हृदय हार बैठे

लक्ष्य न कोई शेष बचे

फँसे निराशा के भँवर में

एक कण जो आशा दे

जो साहस, प्रेरणा भर दे

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

रुष्ट पृथ जब कंपन करे

जीवन का मर्दन करे

प्रलय बाद जो जीवन जागे

उस नव-प्रभात में

मनुज के पराक्रम में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

किंकर्तव्यविमूढ़ समर में

घात प्रतिघात के भँवर में

फाल्गुनी की निराशा हरे

वो स्थितप्रज्ञ जो उन्मेषित करे

कर्तव्य पथ पर अग्रेषित करे

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

प्रदीप्त उजियार में

घनघोर अंधकार में

दुर्गा के प्रहार में

काली के संहार में

जन्म में, मृत्यु में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

ब्रह्मा की रचनात्मकता में

नारायण की मोहकता में

शिव की अभ्यंकरता में

नारी की कोमलता में

पुरुष की दृढ़ता में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में

जीवन के हर द्वार में

काल के विधान में

आत्मा के स्पंदन में

परमात्मा से सम्मिलन में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.


तेरे यत्र तत्र बिखराव में

आवृत में अनावृत में

सत्य की अग्नि में 

सूक्ष्म में विराट में

पहचान मुझे!!

मैं हूं, में ही तो हूँ..

Monday, November 3, 2025

जीत मुबारख हो!!!

 मुबारख हो तुम्हें पसीने में नहाई

ये जीत लड़कियों!


मायने रखती है बहुत 

मेहनत से आई ये जीत लड़कियों!


इसलिए नहीं कि चैंपियन हो 

आज तुम लड़कियों!


बल्कि इस लिए कि खुशी से उछलने वाले 

पुरुष थे लड़कियों!


वो तुम्हारे संघर्ष में, जश्न में 

साथ उतने ही थे जितनी तुम थी लड़कियों!


जीत है ये भी कि शक नहीं था कोई, 

तुम ये न कर पाओगी लड़कियों!


इस उल्लास में मिटी गैर बराबरी इसलिए

मुबारख हो ये जीत लड़कियों!


03.11.25