Thursday, November 2, 2023

एक मौन जो सब कहता

एक आयामी नद से विवश

बहने को सागर की ओर, 

एक काली रात की प्रतीक्षा

देखने की सुनहरी भोर, 

एक अर्भ से उजड़े बाग का

हृदय, सावन में लेता हिलोर, 

एक गीत जिसकी रागिनी

झूमे, बांध तरंगों की डोर, 

एक जन्म स्वयं का

कटता, बाँध मृत्यु से छोर, 

एक मौन जो सब कहता

स्वर, जो लीन शांति में घनघोर.

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02.11.23

 


Tuesday, October 31, 2023

बहार तू क्या गई चमन से..

बहार तू क्या गई चमन से..

हँसी का कतरा कोई जो

खिलने से पहले बिखर गया हो जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

पलकों पर एक बोझ भारी सा हो

मानो एक समुंदर रखा हो जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

थम सा गया दरिया हो

बहने से नदी ने इंकार किया हो जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

चाँद डूबा स्याह रातों में हो

बनी तक़दीर अमावस ही हो जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

एक ज़िद ने तोड़ा हो

मानो उम्र भर के भ्रम को जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

बुत सा दिखता अक्स हो

हादसों ने बनाया पत्थर हो जैसे.

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30.10.23

 

Wednesday, October 25, 2023

मौन विवशता को पहचानना तू

वक़्त की पैमाइश पर

कभी दिखे जो विपरीत खड़े

अदृश्य कारण ने हों पाँव जकड़े,

इसे नियति का लेख मान

स्वीकारना तू! 


सदा शब्द ही नहीं बोलते

मौन भी बोलता है कभी

और शब्द होते मजबूर,

आँखों की भाषा तब

पहचानना तू!


जीवन सागर में उत्पात करें लहरें

होकर विवश इन लहरों से

कभी डोले जो नैया उलट धार,

इसे जीवन का खेल मान

स्वीकारना तू!


जो सजाता, उजाड़ता जगत को

उसने ही लिखे स्मित और अश्रु के

ऐसे खेल कई,

इसे विधि का विधान

जानना तू!


वक़्त की चाक पर घूमते

दिन रात, एक दूसरे के उलट

देखते पहरों में जीवन को कटते,

ऐसी मौन विवशता को

पहचानना तू!


विपरीत ध्रुव साधते धरा को

दूर दिखते पर दूर नहीं

युगों की प्रतीक्षा मिलती क्षितिज पे

प्रकृति का यह सत्य

जानना तू!

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25.10.23

 


Wednesday, September 27, 2023

तुम्हें कैसे विदा दूँ प्रिय!

हलाहल के प्याले

टपकते नयनों से

हृदय में अंगार लिए

घेर खड़े विरह भेरी

तुम्हें कैसे विदा दूँ प्रिय!


अभी तो थम के

श्वांस ली थी तनिक

क्षितिज पर देख अरुणोदय

फूटी कलियां सुवासित मलय

तुम्हें कैसे विदा दूँ प्रिय!


शेष ही रहा

जो कहना था चाँदनी में तुझसे

अभी तो श्रृंगार

मिला नहीं दृष्टि से जी भर के

तुम्हें कैसे विदा दूँ प्रिय!


समर तुम्हें पुकारता

काँपता हृदय मेरा

अनजान भय से

पग की बेड़ी नहीं तुम्हारी

तुम्हें कैसे विदा दूँ प्रिय!

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26.09.23

Thursday, September 14, 2023

युद्ध है तो युद्ध ही सही

 घिर जाए मन 

जो कभी दुविधा से

हो जाए उजाड़ 

दुनिया की भीड़ भाड़ से


पग हों छलनी

राह के शूलों से

दृष्टि होवे भ्रमित

गहरी धुंध से


श्वान भरते हों हुंकार

लड़ने को सिंह से

श्वास में घुले विष

मानो निकले भुजंग से


इस शोर में 

थमना, निर्विकार से

निकालना स्वयं को

दुविधा के ज्वार से


छूना क्षितिज को

गुज़र, राह के शूलों से

देखना इक किरण को

लड़ते हुए काली धुंध से


धैर्य से उठाना कदम

भिड़ जाना श्वानों के झुंड से

बांधना विष को कंठ पे

भुजंगधर,अभ्यंकर से


युद्ध है तो युद्ध ही सही

ये चुनौती है स्वीकार मुझे

भयभीत न होता क्षत्रिय

पिनाक की टंकार से


ठहरना ओ! वक़्त

लिखना है नाम अपना मुझे

इस अम्बर,धरा पर

तलवार की धार से


14.09.23