Sunday, November 5, 2023

अभी थका नहीं मैं

अभी थका नहीं मैं

तिमिर से लड़ते हुए

किरनपुंज है व्यग्र

मेरे हृदय का

इस तम को देखने को

छँटते हुए..


फिर बजेगी रणभेरी

सूरज से आँख मिलाते हुए

चमकेगी असि

ले नाम भवानी का

देखेगा काल तड़ित को

लहराते हुए..


अभी शेष है

तप्त प्रवाह रुधिर का

उद्वेग खड़ा, भय को बाँधे हुए

यौवन फड़कता ललकार पर

देखेगा रण पौरुष को संघर्ष

करते हुए..

+

04.11.23

 


Friday, November 3, 2023

प्रेम कुचला गया ठोकरों में

प्रियतमायें हुई लांछित

विदुषियों को दूषा समाज ने,

जिसे समझा सौभाग्य पांचाली ने

अहो! वह बना दुर्भाग्य कैसे,

अरण्या हुई वह सीता भी

जिसका वरण किया स्वयं राम ने,

भस्म हुई वह सती भी

जिसका बन्धन बंधा शिव से,

वासना ने घेरा हृदय को

प्रेम कुचला गया ठोकरों में,

कायरों ने भोगा वैभव

पौरुष, दहित हुआ संघर्ष में,

मृत्यु के भय ने

जीवन बनाया शमशान जैसे.

+

02.11.23

 


Thursday, November 2, 2023

एक मौन जो सब कहता

एक आयामी नद से विवश

बहने को सागर की ओर, 

एक काली रात की प्रतीक्षा

देखने की सुनहरी भोर, 

एक अर्भ से उजड़े बाग का

हृदय, सावन में लेता हिलोर, 

एक गीत जिसकी रागिनी

झूमे, बांध तरंगों की डोर, 

एक जन्म स्वयं का

कटता, बाँध मृत्यु से छोर, 

एक मौन जो सब कहता

स्वर, जो लीन शांति में घनघोर.

+

02.11.23

 


Tuesday, October 31, 2023

बहार तू क्या गई चमन से..

बहार तू क्या गई चमन से..

हँसी का कतरा कोई जो

खिलने से पहले बिखर गया हो जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

पलकों पर एक बोझ भारी सा हो

मानो एक समुंदर रखा हो जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

थम सा गया दरिया हो

बहने से नदी ने इंकार किया हो जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

चाँद डूबा स्याह रातों में हो

बनी तक़दीर अमावस ही हो जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

एक ज़िद ने तोड़ा हो

मानो उम्र भर के भ्रम को जैसे.


बहार तू क्या गई चमन से..

बुत सा दिखता अक्स हो

हादसों ने बनाया पत्थर हो जैसे.

+

30.10.23

 

Wednesday, October 25, 2023

मौन विवशता को पहचानना तू

वक़्त की पैमाइश पर

कभी दिखे जो विपरीत खड़े

अदृश्य कारण ने हों पाँव जकड़े,

इसे नियति का लेख मान

स्वीकारना तू! 


सदा शब्द ही नहीं बोलते

मौन भी बोलता है कभी

और शब्द होते मजबूर,

आँखों की भाषा तब

पहचानना तू!


जीवन सागर में उत्पात करें लहरें

होकर विवश इन लहरों से

कभी डोले जो नैया उलट धार,

इसे जीवन का खेल मान

स्वीकारना तू!


जो सजाता, उजाड़ता जगत को

उसने ही लिखे स्मित और अश्रु के

ऐसे खेल कई,

इसे विधि का विधान

जानना तू!


वक़्त की चाक पर घूमते

दिन रात, एक दूसरे के उलट

देखते पहरों में जीवन को कटते,

ऐसी मौन विवशता को

पहचानना तू!


विपरीत ध्रुव साधते धरा को

दूर दिखते पर दूर नहीं

युगों की प्रतीक्षा मिलती क्षितिज पे

प्रकृति का यह सत्य

जानना तू!

+

25.10.23