Saturday, September 26, 2026

सन्देह में चुनाव आयोग

 अजीब सी आशंकाओं और ग्लानि से मन भरा है। जब से इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और उसके बाद के घटनाक्रम को देख रही हूं मन परेशान होता जा रहा है। पिछले कई वर्षों से राहुल गांधी एवं विपक्ष के लगभग सभी नेता कभी न कभी चुनाव आयोग और ई वी एम को संदिग्ध साबित करने के प्रयास करते रहे है। लेकिन मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि जिस चुनाव प्रक्रिया में लाखों लोग शामिल हैं, चुनाव करवाने में इस देश मे एक इतना बड़ा तंत्र सीधे सीधे शामिल है उसमें क्या कुछ मुट्ठी भर लोग भी ऐसे नहीं होंगे जो गलत और बेईमानी के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हों? इस कारण मुझे इस व्यवस्था में अनेक दोषों के बाद भी विश्वास बना रहा। हमेशा यह लगता रहा कि कुछ गड़बड़ियां अवश्य हो सकती हैं पर पूरी चुनाव प्रक्रिया ही संदिग्ध, अविश्वसनीय और असफल नहीं हो सकती। लोकतंत्र में संस्थाओं की शुचिता निष्कलंक और असंदिग्ध रहना लोकतंत्र के लिए परम आवश्यक है। लेकिन जो कुछ भी सामने आ रहा वो बेहद दुखी और चिंतित करने वाला है। सच क्या है??? शायद कभी स्पष्ट नहीं हो पायेगा। ऐसी परिस्थितियों में आम जनता को किस पर विश्वास करना चाहिए? क्या आज सड़को पर विपक्ष जो करने का प्रयास कर रहा है उसमें सच है या यह भी चुनाव से प्रेरित है, अब हमें बेवकूफ बनाया जा रहा कि पहले बनाये गए? सच क्या है सोच सोच कर मन परेशान है। मीडिया, न्यायपालिका,कार्यपालिका कौन विश्वास करने योग्य रह गया है? लोकतंत्र में फैसले क्या अब सड़कों पर ही होंगे? क्या जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की कोई नैतिकता शेष नहीं बची है? एक समाज के रूप में हम कितने खोखले हो चुके है, व्यवस्था जिसे भी चुनती है, पदों पर आसीन करवाती है वे सब अपने उत्तरदायित्व से आंखे कैसे बन्द कर लेते है? शायद हमें एक समाज के रूप आत्मवलोकन की गहरी आवश्यक्ता है एक भ्रष्ट और कायर समाज एक भ्रष्ट और कायर व्यवस्था ही बनाएगा, जहाँ सब मौका आने पर एक जैसे ही अनैतिक सिद्ध होगें किसी मे भी गलत को रोकने का साहस नहीं होगा। इनके नाम अलग अलग हों सकते हैं पर दुर्भाग्य से कार्यशैली एक सी निकलेगी।

इति

Thursday, August 27, 2026

ये किसके अधरों से

 ये किसके अधरों से टपकी

 लालिमा नभ में है?

ये किसके कंठ का मधुप

पक्षियों के कलरव में है?

है कौन जिसने पुष्पों पर

बिखेरा अपना नमक है..

ये किसके नयनों की आस

तैरती क्षितिज में है?

ये किसके आँचल के रंगों से 

सजी धरा है?

ये कौन झुरमुट में खड़ा

वसुधा पर डाले बांहों का घेरा है?

है किसका ये श्यामल प्रतिबिम्ब?

उकरा श्वेत झील के कोरों पर है..

ये किसकी बांसुरी की तान पे

नाचती भोर है

ये किसकी स्मृति में

खोई पायल राधे की

गुमसुम निहारे चहुँ ओर है..


27.08.26

Sunday, August 9, 2026

राहुल गांधी

 कहते है कि संघर्ष व्यक्तित्व को परिष्कृत करता है, प्रत्येक व्यक्ति का संघर्ष अलग अलग तरह का हो सकता है।

आजकल नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी को देख कर ऐसा लग रहा कि वे अपने हिस्से का संघर्ष कर चुके है। उनके वक्तव्यों, मुद्दों और छात्रों के साथ संवाद में दिख रहा कि वे जनता की नब्ज समझ चुके है। जिस तरह से पहली बार वो संघ और भाजपा की रणनीति पर सधे हुए हमले कर रहे और लोगो को यह समझाने में सफल हो रहे है कि कैसे ये व्यवस्था अब तक कुछ भी परिणाम नहीं दे सकी है मात्र मीडिया मैनेजमेंट और संस्थानों पर नियंत्रण के बल पर सत्ता पर पकड़ बनाई हुई है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष सरकार के लिए खुद ही एक लक्ष्मण रेखा खींच देता है। भले देर से ही सही विपक्ष की मजबूत आवाज सुनाई दे रही तो यह शुभ संकेत है। राहुल गांधी की इस परिपक्वता और प्रयासों का स्वागत है...


09.08.26

Thursday, July 23, 2026

सत्ता की अहंकार

 जब सत्ता रखती 

रखैल हो,

लोकतंत्र के स्तंभों को 

जब महफिलों में 

सत्ता की,

करती मुजरा मीडिया हो,

जब माय लार्ड !

बनाते जाम हो

ऐसी किस्मत पर

सत्ता को 

क्यों न अहंकार हो?


इस लोकतंत्र में जहाँ

तंत्र प्रतिगामी हो,

जनतंत्र में घुटती

लोगो की सांस हो,

झूठ का गुंडाराज हो

फिर भी मौन सर्वत्र हो

ऐसी राजशाही पर

सत्ता को 

क्यों न अहंकार हो?


जब चोर दरवाजे से

बिकी विपक्ष की

आवाज हो,

जब भूल संविधान 

नौकरशाही ने,

सत्ता को ही

माना भगवान हो

जब शिक्षक का

ज़मीर गिरवी,

कलम मोहताज हो,

ऐसी गुलामो की फौज पर

सत्ता को

क्यों न अहंकार हो?


जब नैनिहाल 

देश के,

पिटते सड़को पर हों

हक़ की बात करने वाले 

सड़ते जेल में हों

जब माफिया के हाथों में

कमान संसाधनों की हो

जब देशभक्ति के,

बदल दिए गए मायने हों

डरी, सहमी कौम हो,

ऐसे गुंडाराज पर

सत्ता को 

क्यों न अहंकार हो?


23.07.26

Wednesday, July 22, 2026

बरसाओ लट्ठ

 बरसाओ लट्ठ, 

उतार दो सिर कांधे से

ये जवानी है कायरों,

डरती नहीं मर जाने से

जुल्म की इंतिहा भी

ओ कातिल

रोक न सकेगी 

इंकलाब आने से!!!

है ये तेरे तौर तरीको की नुमाइश

तो है हमारे भी हौसलों की आजमाइश

ज़ालिम जीतेगा या सब्र

ये लिखेगा वक़्त

हमने बनाया अब 

खूं को अपने

रोशनाई है...


20.07.26

जनादेश से निकले

 सुनो बच्चों!!

बेशक तुम्हारा आग्रह जायज़ है

और गुस्सा भी, 

इस नक्कारी व्यवस्था पर।

नहीं है गलत 

विरोध का रास्ता भी,

मुर्दा बन जीने से 

जुबां खोल

मरना ही सही

पर सोचो ठहर के!

एक दिन ...

जनादेश से निकला जो दैत्य था

वह क्या 

भूख हड़तालों से जाएगा?

जिसे हमने बैठाया

सिंहासन पर..

वो लाठियां खाने से 

हट जाएगा?

जिसे हमने किया पैदा,

उसे हमे ही 

मिटाना होगा 

जनादेश से 

आये दैत्य को 

जनादेश से भगाना होगा..

जी जाएंगे

ये रक्तबीज फिर से..

जो एक डग भी 

फिसला तुम्हारा अहिंसा से

ये नई साजिशें रचेंगे

बांटेंगे तुम्हें फांक फांक

फूट से तुम्हारी,

सत्ता का रास्ता बनाएंगे

दे कर अफीम

धर्म की!

शरीर तुम्हारे 

नोच खाएंगे,

लोकतंत्र में

सत्ता का मद

बैलेट से उतारा जाता है..

राजनीति के दम्भ को

चुनाव में झाड़ा जाता है,

है स्वांग चहुँ ओर

तुम इनसे बच कर निकलना

तुम्हें कीड़ा मकौड़ा 

समझने वाली

राजनीति को

चुनाव में राजनीति सिखाना

भूल जाना,

हिन्दू-मुसलमान

अगड़ा या पिछड़ा

रखना याद तिरंगा 

और ये कि 

बस भारतीय हो तुम!!!

है लोकतंत्र में 

आस्था इस देश की

इसी मार्ग से

अहंकार को धूल चटाना,

जनादेश से निकले दैत्य को

जनादेश से भगाना...


22.07.26

Tuesday, July 14, 2026

 नही होता घटित अकस्मात,

जीवन में , कुछ भी

न ही रोकता प्रतिरोध,

न बदलता परिणाम, कुछ भी

बहती नदिया सागर तक

काट पहाड़ जैसा, कुछ भी

ठहरता नही इस धरा पर 

जड़ चेतन, कुछ भी

बीतते, सुंदर-असुंदर सब

नहीं बांधता उन्हें, कुछ भी

है दृष्टि, दिशाओं का भेद

अतिरिक्त नहीं, कुछ भी

लिखे नियति विपरीत दिशा से

पढ़ते हम उलट, कुछ भी

अकस्मात होता हमारे लिए

विधि हेतु नहीं ऐसा, कुछ भी

मुक्ति में छिपी मुक्ति

न जाता चिता तक, कुछ भी


02.07.26

 एक एक सांस लड़

मृत्यु से जीता हूँ,

क्या बेंधेंगे विष बाण मुझे?

मैं मृत्यु शय्या से उठा हूँ...


हूँ तनिक नहीं विचलित मैं

जीवन पथ की कठनाइयों से,

क्या विचलित करेंगे ये मुझे?

मैं संघर्षों से प्रेरणा लेता हूँ..


दौड़ता लहु धमनियों में

करता उद्घोष ये!!

समर यह न थमेगा,

मैं योद्धा बन कर आया हूँ...


12.07.26

 दुनिया की सारी 

जंगे लड़ी गई

शांति के नाम पर..

बहाया गया लहु इंसानों का

शांति के नाम पर..

जो थी सहज सुलभ

बस एक कदम रुकने पर,

उसे लहु से रंगा गया

शांति के नाम पर..

सदियों जैसे 

ठेकेदारों ने है बेचा ईश्वर को,

धर्म के नाम पर..

वैसे ही बेचते 

कुछ दलाल युद्ध को, 

शांति के नाम पर..

मकसद युद्ध के 

हो जाते बौने,

छूट जाते पीछे कहीं

युद्ध को थोपा गया, 

शांति के नाम पर..

कुछ यू हीं 

जैसे धंधा बनाया भगवान को

विषवृक्ष रोपा गया,

धर्म के नाम पर..

दान,चढ़ावों पर पलते मठाधीश

रोटी को तरसता बचपन

बिकते देह

चूल्हों में आग

जलाने को,

धर्म के नाम पर..

यूं ही कुछ सजते 

असलहों के बाज़ार

शांति के नाम पर..

धर्म और शांति

दोनों ही बिकते

छद्म मुखौटों में..

 लूटा,ठगा जाता 

हर बार इंसान,

कभी शांति कभी

धर्म के नाम पर..


14.07.26

Thursday, January 15, 2026

पहचान मुझे!!

 जड़ में, चेतन में

धारों के प्रवाह में

स्रोतों के उछाह में

उपवन की हरीतिमा में

आकाश की नीलिमा में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

पहाड़ों के ठहराव में

घाटियों के गहराव में

धरा के फ़ैलाव में

ज्वलंत अग्निशिखाओं में

शीतल, ठंडी छाव में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

जलधि के अंतस में घूमते ज्वार में

महाकाल के हुँकार में

ध्वनियों के संगम ओंकार में

आकार में, निर्विकार में

व्योम से अंतरिक्ष के एकाकार में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

सृष्टि की सुंदरता में

रण की वीभत्सता में

प्रत्यक्ष में, अदृश्य में

घटित में, अघटित में

प्रसन्नता, शोक में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

जब हृदय हार बैठे

लक्ष्य न कोई शेष बचे

फँसे निराशा के भँवर में

एक कण जो आशा दे

जो साहस, प्रेरणा भर दे

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

रुष्ट पृथ जब कंपन करे

जीवन का मर्दन करे

प्रलय बाद जो जीवन जागे

उस नव-प्रभात में

मनुज के पराक्रम में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

किंकर्तव्यविमूढ़ समर में

घात प्रतिघात के भँवर में

फाल्गुनी की निराशा हरे

वो स्थितप्रज्ञ जो उन्मेषित करे

कर्तव्य पथ पर अग्रेषित करे

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

प्रदीप्त उजियार में

घनघोर अंधकार में

दुर्गा के प्रहार में

काली के संहार में

जन्म में, मृत्यु में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

ब्रह्मा की रचनात्मकता में

नारायण की मोहकता में

शिव की अभ्यंकरता में

नारी की कोमलता में

पुरुष की दृढ़ता में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.

 

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में

जीवन के हर द्वार में

काल के विधान में

आत्मा के स्पंदन में

परमात्मा से सम्मिलन में

मैं ही हूँ, मैं ही तो हूँ.


तेरे यत्र तत्र बिखराव में

आवृत में अनावृत में

सत्य की अग्नि में 

सूक्ष्म में विराट में

पहचान मुझे!!

मैं हूं, में ही तो हूँ..

Monday, November 3, 2025

जीत मुबारख हो!!!

 मुबारख हो तुम्हें पसीने में नहाई

ये जीत लड़कियों!


मायने रखती है बहुत 

मेहनत से आई ये जीत लड़कियों!


इसलिए नहीं कि चैंपियन हो 

आज तुम लड़कियों!


बल्कि इस लिए कि खुशी से उछलने वाले 

पुरुष थे लड़कियों!


वो तुम्हारे संघर्ष में, जश्न में 

साथ उतने ही थे जितनी तुम थी लड़कियों!


जीत है ये भी कि शक नहीं था कोई, 

तुम ये न कर पाओगी लड़कियों!


इस उल्लास में मिटी गैर बराबरी इसलिए

मुबारख हो ये जीत लड़कियों!


03.11.25

Wednesday, October 15, 2025

फिर एक जंग हिस्से आ गई

 फिर एक जंग हिस्से आ गई

है अजब मुहब्बत, अदावत को हमसे

बार- बार हमसे टकरा गई


तूने किया तय, संग लश्कर के आना

जंग के उस पार खड़ी तू,

मत सोच मुहब्बत मेरी हार जाएगी


जाएगा जुनून मेरा जंग में

जानेमन!! हज़ार लश्कर चीर के

लाएगा इश्क़ मेरा तुझे छीन के


निभाएंगे हम अपनी मुहब्बत

तू अपनी ज़िद आज़माना

है कबूल हमे अब ये जंग भी


फिर एक जंग हिस्से आ गई...


12.10.25

Friday, September 19, 2025

एक फांक ज़िन्दगी से

 एक फांक ज़िन्दगी से

दे जाऊंगी तुम्हें

रखना सम्भाल के..


बहुत सी यादें

अनगिनत बातें

रखना सम्भाल के..


यदाकदा ही मिलते

दो सिरफिरे एक से

मुलाकातें, रखना सम्भाल के..


सूर्योदय से चमकते

चांद सी शांत भावनाएं

रखना सम्भाल के..


होंगे टूटते रिश्ते

सबसे गहरा रिश्ता ये

रखना सम्भाल के..


लिखेंगे नई इबारतें

मित्रता के क्षितिज पे

स्नेह,रखना सम्भाल के..


19.09.25

Wednesday, September 17, 2025

क्रांति

 ओ क्रांति!! सुना है तुम

तख्त ओ ताज उखाड़ देती हो

रंगीन सपने दिखा

सुंदर बाग उजाड़ देती हो

जिन्हें सजाना है गुलशन

उनके हाथों में मशाल थमा देती हो


निराशा के समंदर का तुम

एक उग्र तूफान हो

सजीली सपनों से सजी

आँखों में तुम ज्वाला जला देती हो

वो ज्वाला जिसमे भस्म

इंसानियत होती सबसे पहले


पर सुनो क्रांति!!

तुम हो रोमांचक,करती सम्मोहित

जहरीले पाश तुम्हारे

है अदभुत आकर्षण तुममें

पर विश्वसनीय नहीं तुम हो

क्योकि नहीं ठहराव तुम में


इंतज़ार न खत्म होगा कभी,

इस ज़मीन पर तेरा ओ क्रांति!!

हैं हरी धरती,बहती कलकल धाराएं है

भरे हैं पेट जनमानस के!

भूखों के पेट मे ही जलती 

पहले तेरी ज्वाला है


हमारे हाथों में हुनर

खेतों में पसीना बहाने की कुव्वत है

हम हैं आस्तिक!

विश्वास पर जीने वाली कौम

झूठे सपने भूखों को होंगे सुहाते

हमारे पेट भरे हुए है क्रांति!!


देखते हैं हम सपनों के उस पार भी

क्रांति!! तुम जब तहस-नहस करके

बुझाओगी अपनी मशाल,

तब कैसे समेटेंगे हम इस तबाही को

कहाँ से आएंगे वो हाथ,?

जो रोकेंगे तेरी शक्ल में आई बर्बादी को


सुनो क्रांति!!

जीवन को समर मान

लड़ने वाले योद्धा हम हैं,

हर संग्राम हमारा सृजन हेतु

कृष्ण आराध्य हमारे

निष्काम कर्म को जीने वाले हम हैं


सोद्देश्य,श्रमिक जीवन जीने वाले हम है

उतार लाया था एक पुरखा हमारा

भागीरथी को हिमालय से

विनाश नहीं सृजन लक्ष्य था उसका

हमें न भटकाओ क्रांति!!

हम जीवन मर्म समझने वाले लोग हैं


निरुद्देश्य हिंसा हमारे 

जीवन का लक्ष्य नहीं

हम स्वप्न सजाने वालों की संतति

पूर्णता की चाह रखने वाली कौम हैं

ये आधी हिंसा,आधी शांति

हमें न सुहाती क्रांति!!


17.09.25

Monday, September 1, 2025

नाग का फन...

 नाग का फन, कुचलने का हुनर सीखा है

बज़्म में तेरी काटा जो अरसा हमने

ज़हर उतारने का हुनर सीखा है।


न सोच कि ज़ाया अपनी ज़िंदगी की है 

तेरी रहबरी में हमने

ज़ालिमो से लड़ने का हुनर सीखा है।


माना कि, एक उम्र बेफिक्र दिखे हम है

संगत में तेरी हमने 

आजमाइश का हुनर सीखा है।


01.09.25

Tuesday, August 26, 2025

वंचना और पीड़ा..

 वंचना और पीड़ा

सिर्फ 

शब्द नहीं..


हैं कथा किसी

दुख 

भरे हृदय की..


हों पहचानते जैसे 

गूंगे

स्वरों का मोल..


यूँ ही पहचानती

 वंचना

गूंगी पीड़ा के बोल..


सुख की छाया में बैठे

आत्ममुग्ध

जाने क्या..


बेबसी में 

बहे

अश्रुओं का मोल..


क्या जाने 

निष्ठुरता

उस प्रतीक्षा को..


जो अपलक जाग रही

नयनों

को खोल..


26.08.25

Wednesday, June 25, 2025

पत्थरों के शहर में

 पत्थरों के इस शहर में

तपती, खामोश दुपहर में

सभ्यता के कचरे में

वह छिरती चंद सिक्को के लिए

बिनती कांटे,कीलें

ज़िंदगी के घाव सीने के लिए

इक लोहे की बुत सी वह

चलती ढेर पर लोहे के

लोहे के इस बेजान से शहर में

बिनती टुकड़े टुकड़े लोहे के 

कई कई टुकड़ो में बंटी रोटी के लिए

हर रोज़ की यही कहानी

कूड़े के ढेर में ही ज़िंदगी जानी

पेट की आग बुझाने को

सभ्य कहलाने वाले शहर की

खामोश गलियों में उम्र गुज़र जानी

Wednesday, June 4, 2025

फिर क्यों ह्रदय प्रश्नों से है घिरा हुआ

 मैं अपनी वंशबेल का

आखिरी बूटा, अंतिम शाख हूँ

है क्यों ह्रदय व्यथित,उद्वेग से भरा हुआ

टूटना तो हर बूटे को,

हर शाख का निश्चित जीवन

फिर क्यों ह्रदय प्रश्नों से है घिरा हुआ


खुद में समेटे खुद की दुनिया

मैं इस दुनिया का 

इकलौता मुसाफिर तो नही हूँ

है यायावरी नसीब अपना

तो नियति को स्वीकारने में

फिर क्यों, कोलाहल है हुआ


मैं अपनी वंश परम्परा का

आखिरी निशान हूँ

क्यों भयभीत सा हृदय मेरा

मिटते तो वो भी, 

हैं जो उत्कीर्ण प्रस्तरों पर

फिर क्यों हृदय विषाद से है घिरा हुआ


27.05.25

Saturday, May 18, 2024

अनंत प्रतीक्षा

 अनंत प्रतीक्षा को प्रेम 

जब उन्मेषित हो वर लेता है


झूमती धरती को आकाश 

जहाँ बाहों में भर लेता है


यत्किंचित न खुलते नयन

जब श्वासों का राग मिलता है


सिंदूरी लालिमा सजती

अलक पर बदरा झूमता है


तब क्षितिज पुलकित

कलियों सा सजता है


मधुप टपकता,पुष्प बरसते

जब यह मिलन होता है


अनंत प्रतीक्षा को प्रेम 

जब उन्मेषित हो वर लेता...


18.05.24

Wednesday, May 8, 2024

जीवन का लक्ष्य

 कलम में रोशनाई पड़ी है तो कुछ उकेरेगी कागज़ पर,इसी तर्ज पर दुनिया मे आएं है तो जियेएँगे ही। जियेएँगे तो पर कैसे ये महत्वपूर्ण हैं। जिंदगी तो ईश्वर प्रदत्त है पर जीवन जीने की कला,जीवन के प्रति सोच इंसानी प्रकृति।

आज दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति परेशान, दुखी, निराश,थका, हारा हुआ सा है। लोगों में वो ज़ज्बा, वो हौसला दिखता ही नहीं जो मुसीबतों को पलट दे। हिमालय से भागीरथी को धरती पर उतार दे।जवानी को जोश का प्रतीक माना जाता है लेकिन आज ये जोश तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर दिखता ही नहीं। अपितु कई बार हम एक ऐसी उम्र के व्यक्ति से जीवन के प्रति विरक्ति की बातें सुनते और महसूस करते हैं जिसने अभी इस जीवन को ठीक से जाना ही नहीं।

क्या परमात्मा ने जीवन त्याग के लिए हमें जीवन दिया है? क्या भोग घृणा की वस्तु है? क्या संसार की गति सन्सार से भागने वाले निर्धारित करते हैं?

क्या जीवन मे सृजन वैराग्य से उत्पन्न हुआ है? इन प्रश्नों के उत्तर आखिर क्या है?

अध्यात्म एक सत्य है,मानव मस्तिष्क की सर्वोच्च गति का मार्ग,पर हम ये कैसे भूल जाते हैं यह मार्ग संसार से होकर गुजरता है। जहाँ हमारे कुछ पूर्व कर्मो के आधार पर दायित्त्व निर्धारित किये है उसी परम् पिता ने जिसके नाम पर कई बार हम संसार से भागने का स्वांग रचते हैं।

आध्यात्मिक मतिभ्रम के इस दौर में त्याग की विचित्र परिभाषाएं और महिमामंडन किया जाता है बगैर उसके अर्थ को समझे। एक बालक से ये अपेक्षा करना कि वो बचपन का त्याग कर दे,एक युवा को प्रेम की नैसर्गिक भावना से दूर रहने को विवश करना,एक गृहस्थ को बुद्धिभ्रष्ट कर गृहत्याग को प्रेरित करना आध्यामिकता नहीं बल्कि ईश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध अविश्वास है।

स्मरण रहे त्याग सदैव उसका ही होता है जो आपने प्राप्त किया,अर्जित किया अपने प्रयासों से। जीवन जिया ही नहीं ,संसार को प्राप्त किया ही नहीं, कुछ भी स्वयं अर्जित किया ही नहीं तो फिर त्यागा क्या? जीवन ईश्वर ने दिया, उम्र और उसकी गति प्रकृति ने निर्धारित की,इनके बीच रहते हुए अर्जित करना ही जीवन का उद्देश्य है। यह अर्जन संसार मे एक योद्धा की भांति पावँ जमाने से होता है न कि मुँह छुपा कर संसार से भागने से। इस अर्जन का आशय माया अर्जित करना मात्र नहीं है,श्री प्राप्त करना इसका लक्ष्य है। माया मोह का कारण है और श्री यश का। माया अधिकारपूर्ण लिप्सा का साधन है और श्री न्यायपूर्ण भोग का।

मोह व्यक्ति को जकड़ता है इस जकड़न से खुद को मुक्त करने का प्रयास आध्यात्म है। यह समझने का प्रयास करना कि हम इस संसार मे आये क्यों?यह जीवन कितने ही और जीवन को अपने लक्ष्य तक पहुँचाने का साधन है इसे स्वीकार कर समर्पण करना ईश्वर में आस्था है।आपका जीवन सिर्फ आपका नहीं यह जानना आवश्यक है।

जीवन विरक्ति नहीं नैतिक आसक्ति है,न्यायपूर्ण भोग है।

जिस प्रकार नदी असीम जलराशि को स्वयं में सिंचित रखती है किंतु खुद सारा जल नहीं पी जाती,औरों के लिए जीवन पथ पर अथक बहती है। यही साधना है,यही तपस्या है। यही जीवन का उद्देश्य है न कि जीवन से हार कर निराश होकर अपनी पराजय को मोह त्याग,सांसारिक विरक्ति नाम पर छुपा लेना। परिणाम ईश्वर द्वारा निर्धारित है लेकिन कर्म करना मनुष्य का धर्म है। प्रत्येक स्थिति से जूझने का हौसला ईश्वर पर विश्वास को दर्शाता है। क्योंकि ईश्वर संघर्ष करने वालों के साथ है,सत्य,न्याय और धर्म के साथ है। संसार मे रहते हुए ईश्वर के मार्ग पर चल कर सत्य की खोज इस जीवन का उद्देश्य है। महायोगी शिव की तरह कर्म,साधना और वियोग को जीना जीवन की परम गति है।


08.05.24